“प्रथमा” पंचगव्य-आयुर्वेद आधारित प्राथमिक चिकित्सा किट

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Description

समस्त विश्व को आरोग्य, आयुर्वेद एवं औषधियों का ज्ञान देने वाले भारत में आज भी पूर्ण चिकित्सा से लेकर प्राथमिक चिकित्सा “फर्स्ट ऐड” तक सभी पर पाश्चात्य चिकित्सा “एलोपेथी” का ही दबदबा है | जबकि हमारे पास सैकड़ो जीवनदायनी औषधियों, गौ-माता एवं आयुर्वेद का ज्ञान होते हुए आजादी के इतने सालों बाद भी “एलोपेथी” पर आश्रित रहना शर्म का विषय है |

इन्ही वेदनाओं से पीड़ित होकर गव्यसिद्धों की एक टीम ने पूर्ण प्राकृतिक, निरापद एवं तेज प्रभाव वाली पंचगव्य-आयुर्वेद आधारित एक प्राथमिक चिकित्सा किट बनाने का निर्णय लिया, और लगभग पांच वर्षो के सतत प्रयास से हजारों रोगियों पर सफल प्रयोग करने के बाद देश की पहली प्राथमिक-चिकित्सा किट “प्रथमा” का निर्माण किया |

प्रथमा” ही क्यों ??

मूल आधार – भारत या कहें विश्व की पहली प्राथमिक चिकित्सा किट का नाम भी “प्रथमा” रखा गया है, अथार्त किसी भी छोटी-बड़ी शारीरिक व्याधी के लिए प्रथम प्रयोग होने वाली औषधियों का संग्रह | इस किट का मूल आधार गौ-माता के पंचगव्य ( गौमय, गौमूत्र, दूध, दही एवं घृत ) एवं आयुर्वेद है |

लाभ – शरीर के किसी भी अंग में होने वाले छोटे बड़े दर्द से लेकर वायरल फीवर, पेट दर्द, सर दर्द, दाद-खाज खुजली, शरीर में कहीं भी खून निकलना एवं चोट लगने पर “प्रथमा” से प्रारंभिक चिकित्सा की जा सकती है |

सुविधा “प्रथमा” को एक सुविधाजनक छोटी सी कपड़े की किट में पैक किया गया है जिसे आप घर पर, यात्रा में अथवा अपनी कार आदि में सभी जगह अपने साथ रखे और प्राकृतिक रूप से प्रारंभिक चिकित्सा करके छोटी-बड़ी समस्या में चिकित्सकों की अनुपलब्धता से होने वाली घबराहट के कारण ली गई गलत चिकित्सा से बचा जा सकता है |

औषधि विवरण

भारतीय नस्ल की शुद्ध देशी गौमाता, जो जंगल में स्वच्छन्द विचरण करती हैं उनके प्रेमपूर्वक लिए शुद्ध गव्य, प्रीसरवेटिव रहित एवं सौ-प्रतिशत प्राकृतिक है।

नस्य-अमृतम् (नासिका औषधि)

गुणधर्म : वैदिक विधि से बने शुद्ध गौघृत, गोबर रस, गौमूत्र, दूध एवं छाछ सभी पांच गव्यों को सूर्य के ताप में तपाकर, दो महीने से अधिक में बनकर तैयार मस्तिष्क संबंधी समस्याओं के लिए श्रेष्ठ औषाधि।

प्रयोगविधि एवं लाभ : वयस्कों के लिए तीन-तीन बूँद एवं बच्चो के लिए दो-दो बूँद दोनों नासिका छिद्रों में रात्रि में सोने से पहले डालना अच्छा है। कटोरी या पतीले में पानी गर्म करके नासिका की शीशी को उसमें रखकर गुनगुना करके ही प्रयोग करना चाहिए। पुराने माईग्रेन ( आधा सिर का दर्द ), किसी भी प्रकार के सर दर्द, बाल झड़ने, असमय सफेद होने, आँखो की रौशनी गिरने, कान में दर्द, अल्प स्मरण शक्ति होने, खर्राटे आने, नाक बंद रहने, नाक की हडृडी बढ़ने, साइनस इत्यादि रोगों में अत्यधिक लाभप्रद।

नोट : अच्छे लाभ हेतु औषधि को कम से कम तीन महीने लगातार या उससे अधिक डालना श्रेयस्कर है।

धारा-अमृतम् (अमृत धारा)

गुणधर्म : शुद्ध भीमसेनी कपूर, पूदिना सत एवं अजवाइन सत से बना श्रेष्ठ पित्तहर्ता

प्रयोगविधि एवं लाभ : वयस्कों के लिए आधा कप पानी में तीन बूँद मिलाकर पीना एवं बच्चों के लिए एक चौथाई कप में एक से दो बूंद मिलाकर पीना अच्छा। ग्रीष्म ऋतु के दस्तों में, हैजा में, विषाप्त भोजन (फूड पॉइज़निंग), उल्टी, एसीडिटी, खट्टी डकार मुँह में छाले इत्यादी होने पर उपरोक्त विधि से पीना अच्छा है। सर दर्द, दांत दर्द, घुटने के अचानक हुए दर्द में दो-तीन बूँद ऊँगली पर डालकर दर्द स्थान पर लगाना श्रेयस्कर है।

सावधानी : दूध पिलाने वाली महिलाओं को अमृतधारा का प्रयोग लंबे समय नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे दूध सूखने का डर रहता है। इसको आँख में लगने से भी बचाना चाहिए।

कर्ण-अमृतम् (कर्ण औषधि )

गुणधर्म : रोहिणी नक्षत्र वाले गौमूत्र से बनी।

प्रयोगविधि एवं लाभ : एक-दो बूँद दोनो कानों में डालना। किसी भी प्रकार के कान के दर्द, पानी आना, ऊँचा सुनना इत्यादि में अत्यंत लाभकारी है।

नयनम-अमृतम् ( नेत्र औषधि )

गुणधर्म : शरद ऋतु की पूर्णिमा का गौमूत्र शुद्ध गुलाबजल एवं शहद को मिलाकर बनी उत्तम नेत्र औषधि।

प्रयोगविधि एवं लाभ : एक एक बूँद दोनो आँखो में सोने से पहले या समस्या के समय डालना अच्छा है। आँखो में थकान, धूल मिट्टी के कारण आँखों में चिपचिपापन, आँखों से हर समय पानी बहने, सफेद मोतिया, एलर्जी इत्यादि में विशेष गुणकारी है।

सावधानी : छोटे बच्चों एवं ऑपरेशन वाली आँखों में नही डालनी चाहिए।

मलहम-अमृतम् (गव्य हल्दी मलहम)

गुणधर्म – गौमूत्र, हल्दी, गेरू एवं एरंड का तेल

प्रयोगविधि एवं लाभ – किसी भी बाहरी चोट अथवा खरोच में तुरंत प्रभावित स्थान पर लगायें। बहते हुए रक्त को रोकता है एवम त्वचा के उपर हुए सभी रोग जैसे दाद, खाज, खुजली इत्यादि में तुरंत आराम देता है। निरंतर प्रयोग से त्वचा रोग का जड़ से निदान होता है।

विशेष – चोट की परिस्थिति में अधिक जलने पर वातनाशक तेल में मिलाकर लगाए एवम चर्म रोग में अधिक जलने पर 2 बूंद अमृतधारा मिलाकर लगाए।

अर्क-अमृतम् (तुलसी गौमूत्र अर्क)

गुणधर्म – गौमूत्र, देसी जीरा, देसी सौंफ एवं तुलसी के योग से बनी प्रयोगविधि एवं लाभ – दो से तीन ढक्कन गौमूत्र अर्क थोड़े पानी में मिलाकर दिन में दो-तीन बार लेना अच्छा है। वायरल ज्वर, खाँसी, सर्दी, एलर्जी इत्यादि के लिए उत्तम।

तेलम-अमृतम् (दर्द निवारक तेल)

गुणधर्म – सरसों तेल, गोमय रस, लहसुन, हठजोड़, निर्गुन्डी, अजवाइन, मैथी दाना के योग से बना श्रेष्ठ दर्द निवारक।

प्रयोगविधि एवं लाभ – एक खाली कटोरी को अग्नि पर तेज गर्म करके उतार लें फिर इसमें आवश्यकतानुसार वातनाशक तेल डालें, जब तेल थोड़ा गुनगुना लगाने लायक हो जाए तो दर्द के स्थान पर लगाएं। तेल के सूखने तक मालिश करें फिर उस स्थान पर सूती कपड़ा बाँध दें और हवा से बचाकर रखें। किसी भी प्रकार के बाह्य दर्द, घुटने का दर्द, जोड़ों के दर्द, पिंडलियों का दर्द, चोट लगने के कारण सूजन आने इत्यादि में विशेष लाभकारी।

फुहार-अमृतम् (नीम गौमूत्र स्प्रे)

गुणधर्म – गौमूत्र एवं नीम के मिश्रण से बना। गौमूत्र एवं नीम श्रेष्ठ प्राकृतिक जीवाणु-विषाणू नाशक।

प्रयोगविधि एवं लाभ – कैसी भी चोट लगने पर, चोट के कारण रक्तरसाव होने पर, पुराने घाव पर, छोटे बच्चों के रैशेस दूर करने के लिए, दाद-खाज एवं खुजली होने पर, मकड़ी काटने के फूलने पर, सेनेटाइज़र के रूप में, आफ्टर शेव लोशन के रूप में प्रयोग करने में अत्यंत लाभकारी। पुरानी चोट एवं घाव पर दिन में 4-5 बार भी लगाने से तीव्र लाभदायक। छोटे बच्चों के लिए भी एकदम सुरक्षित।

विशेष सावधानी – यह चिकित्सा किट केवल प्रारंभिक चिकित्सा प्रयोग हेतु है। समस्या के गंभीर होने पर तुरंत अपने नज़दीकी गव्यसिद्धों, आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक डॉक्टर से सलाह लें।

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