Mathni Ghrit ke labh

गर्भवती महिलाओं के लिए प्राकृतिक प्रसव में सहायक:

  • आयुर्वेद में पारंपरिक विधि से बना गौ घृत गर्भवती महिलाओं के लिए सर्वोत्तम औषधि बताया गया है, ये शरीर मे स्निग्धता बनाये रखता है। ये स्निग्धता शरीर की वायु को सम रखती है।और इसी सम वायु के कारण गर्भ का जल कभी नही सूखता। और पूरे नौ महीने प्रचुर मात्रा में गौ घृत खाने वाली महिलाओं को प्राकृतिक प्रसव होने की प्रबल संभावना बनती है।
  • प्राकृतिक रूप से जन्मे बच्चे चीर-फाड़(आपरेशन) से पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में बेहद बुद्धिमान और निरोगी होते हैं।
  • प्राकृतिक जन्म देने वाली महिलाएं जल्दी ही अपनी पुरानी शरीर रचना को प्राप्त करती हैं, उनके शरीर मे अच्छा दूध बनता है और वो आपरेशन कराने वाली महिलाओं से कई गुना अधिक स्वस्थ होती हैं।

उत्तम संतान प्राप्ति हेतु

भारत मे हर गर्भिणी की चाह होती है कि उसका बच्चा भगवान कॄष्ण जैसा हो। इसलिए गर्भ धारण का समाचार सुनते ही घर मे नन्हे गोपाल की तस्वीरें लगा दी जाती हैं। किन्तु भगवान कृष्ण जैसी संतान प्राप्ति के लिए आयुर्वेद के नियम अर्थात नौ महीने देशी गाय का घी अवश्य खाना चाहिए।

  • पारंपरिक गौ घृत में उपलब्ध वसा माँ के शरीर की सहायता कर भ्रूण को प्राकृतिक रूप से विकसित करता है।
  • गर्भावस्था की पूरी अवधि में गौ घृत खाने वाली महिलाओं के बच्चे शारीरिक रूप से बलिष्ठ और मानसिक रूप से बुद्धिमान होते हैं।
  • इन बच्चों की प्रतिकारक(इम्युनिटी) क्षमता बेहद उच्च कोटि की होती है और ये आम बच्चों की तरह जल्दी जल्दी बीमार नही पड़ते।
  • ऐसे बच्चे बड़े होकर बड़े वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर बनते हैं, ये बच्चे बेहद फुर्तीले और दमखम वाले होते हैं इसलिए अच्छे खिलाड़ी भी बनते हैं। ये बच्चे सदैव अपने गांव, अपने क्षेत्र, अपने देश के लिए काम करने वाले बनते हैं। ये बच्चे आज्ञाकारी होते हैं।

खाने की विधि

नौ महीने प्रतिदिन दाल सब्जी में दो-दो चम्मच और रात्रि में दूध में दो- दो चम्मच डालकर खाना।
एक महीने में लगभग 1.5- 2 किलो शुद्ध गौ घृत खाना चाहिए।

जच्चा- बच्चा का प्राकृतिक टॉनिक

  • पारंपरिक गौ घृत ना सिर्फ प्राकृतिक प्रसव में सहायक है बल्कि बच्चा होने के बाद माँ के शरीर का कैल्शियम बहुत कम हो जाता है और शरीर मे वात बढ़ जाता है । इसी खोये हुए कैल्शियम आदि खनिजों को दोबारा वापिस करने की क्षमता अगर किसी प्राकृतिक वस्तु में है तो वो है गौ घृत।
  • ये गौ घृत ना सिर्फ कैल्शियम आदि खनिज शरीर को वापस देता है बल्कि वात(वायु) प्रकोप को भी समाप्त करता है।
  • ये वात प्रकोप समाप्त होने के बाद महिला फिर से अपनी पुरानी शरीर रचना प्राप्त करती है अर्थात माँ बनने के बाद गौ घृत खाने वाली महिलाएं कभी मोटी नही होती। उनके शरीर से सभी दर्द समाप्त हो जाते हैं।
  • ऐसी महिलाओं के शरीर मे दूध पर्याप्त मात्रा में बनता है और यही दूध नवजात के लिए अमृत होता है। इनके बच्चे दूध की कमी से कभी भूखे नही रहते और उनका शारीरिक और बौद्धिक विकास उच्च श्रेणी का होता है।

खाने की विधि पात या हरीरा बनाने की विधि

एक ग्लास पानी (200ml) में 125 ग्राम शुद्ध गुड़ डालकर पकाएं। एक चम्मच जीरा, आधा चम्मच आधा चम्मच अजवाइन, एक चौथाई चम्मच सूंठ को शुद्ध घी में भून लें। फिर इस मिश्रण को गुड़ वाले पानी मे डालें। अब इस पानी मे सौ ग्राम शुद्ध गौ घृत डालें।
इसको अच्छे से पकने के बाद कढ़ाई से उतारकर इसमे गुलबन्दी बादाम 5-6 गिरी छोटे छोटे टुकड़े करके डालें, इसमे खरबूजे के बीज अर्थात मींग डालें, और थोड़ा पका हुआ गोला घिस कर भी डाल सकते हैं।
इस प्रकार शुद्ध गुड़ और गौ घृत रूपी मुख्य घटकों को डालकर कर बन गयी पात या हरीरा।
पत्तिदिन सुबह शाम पात का सेवन करने से मा के शरीर का खोया हुआ कैल्शियम ,आयरन आदि खनिज इस पात के सेवन से पुनर्स्थापित होता है। वायु का प्रकोप शांत होता है और महिला को जीवन भर वायु के प्रकोप का दर्द नही होता और वो पुनः पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करती है। माँ के शरीर मे भरपूर दूध बनता है और बच्चा दूध पीकर संतुष्ट और निरोगी बनता है।
यह हरीरा भारत के प्रत्येक क्षेत्र में अलग अलग औषधि और मात्रा से बनता है किंतु इसका मुख्य घटक पूरे भारत मे गुड़ और शुद्ध गौ घृत ही है। उपरोक्त विधि पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ और बिजनोर आदि क्षेत्र में प्रचलित विधि है।