FAQ's

गंगा की तराई में रहने वाली गाय को गंगातीरी कहते हैं। भारत सरकार के द्वारा 35 अलग अलग भारतीय गायों को सूचीबद्ध किया गया है। जिसमे से एक गंगातीरी भी है। क्विक लिंक गंगातीरी पर क्लिक करके गंगातीरी गाय के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

जिस प्रकार भारत मे बहने वाली हर नदी  गंगा के समान पवित्र है , ठीक उसी प्रकार भारत के प्रत्येक प्रदेश की हर गाय अपने आप मे विशिष्ट है।गंगातीरी गाय गंगाजल द्वारा सिंचित गौचर में उपलब्ध बेशकीमती औषधियों और विशेष प्राकृतिक घास खाकर अपना भरण पोषण करती है। ये कम दूध देती है इसलिए भारतीय समाज द्वारा तिरस्कृत हो गयी है, यही इसकी विलुप्ति का मुख्य कारण है। किंतु जो गाय कम दूध देती है उसका दूध अमृत है। गौअमृतं घृत प्रकल्प द्वारा गंगातीरी गाय का खोया सम्मान दिलाने और इसका संवर्धन करने का ये पहला और अनूठा प्रयास है।

35 प्रचलित प्रजातियों में गंगातीरी भी है। ये भी शुद्ध भारतीय देशी गाय है। आप निश्चिन्त होकर इसके दूध और घृत का सेवन कर सकते हैं।

गौअमृतं मथनी घृत भारत का पहला घृत है जिसमे गंगातीरी गाय का शुद्ध दूध मिट्टी के पात्रों में पकाया जाता है। फिर रात्रि में दही जमाने के लिए जामन लगाया जाता है और सुबह समुद्र मंथन विधि की मथनी में दही को दाएं बाएं मथ कर मक्खन निकाला जाता है ।फिर मक्खन को सूक्ष्म आंच पर तपाकर घृत बनाया जाता है। मथने की प्रक्रिया के कारण इसे मथनी घृत नाम दिया गया है।

गौअमृतं मथनी घृत विशुद्धतम घृत है। इसमे प्रयुक्त दूध से लेकर इसको बनाने की विधि पूर्ण शास्त्रोक्त है। एक लीटर घी बनाने में लगभग 30-32 लीटर दूध का प्रयोग होता है। दूध गर्म करने के लिए मिट्टी की हंडिया का प्रयोग होता है और लकड़ी की मथनी से दाएं बाएं मथकर नवनीत (मक्खन) निकाला जाता है। ये पूरी प्रक्रिया धीमी होने के कारण मेहेंगी लेकिन शुद्ध है । ये घी बाजार की प्रतिस्पर्धा में नही है बल्कि उन गिने चुने लोगों के लाभार्थ है जो सिर्फ शुद्धतम घृत के अतुल्य लाभ जानते हैं।

बाजार में उपलब्ध अन्य सस्ते घी होने के कारण में कहीं दूध शुद्ध नही है ,तो कहीं एल्युमीनियम के बर्तन में तेज अग्नि पर दूध को पकाया जा रहा है, कहीं एक दिशा वाली तेज गति मथनी से दही को बिलोया जा रहा है, कहीं प्लास्टिक की बर्नी में घी पैक किया जा रहा है।

वहीं गौअमृतं घी को बनाने में सर्वोच्च और कड़े मापदंड रखे गए हैं और अगर उन सभी मापदंडो को देखा जाए तो गौअमृतं घी “उचित मूल्य पर उत्कृष्ट उत्पाद ” की परिभाषा पर खरा उतरता है।

प्राकृतिक रूप से गाय घूमने वाला जीव है। गाय को घूमने में आनंद आता है और गाय जितना आनंद में रहेगी उसके गव्य(दूध, गोमय, और गौमूत्र) उतने ही उत्कृष्ट होंगे। गाय सूर्य की प्रतिनिधि है उसकी सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य की रोशनी में जागृत होकर उसकी अदृश्य ऊर्जा को अवशोषित करके अपने दूध में मिला देती है। इसलिए प्राकृतिक गौचरण में घूमने वाली गाय का दूध सूर्य की अदृश्य ऊर्जा का भंडार होता है। प्राकृतिक गौचरण स्वयं विकसित होता है वहां जहरीले खाद जैसे यूरिया, डी ए पी एवं रायायनिक कीटनाशक नही डाले जाते जिससे गौमाता का भोजन पूर्णतया प्राकृतिक और जहरमुक्त होता है। प्राकृतिक गौचरण में बेशकीमती औषधियां और जड़ी बूटी स्वतः ही उगती हैं और जिन्हें खाकर गौ माता अमृत तुल्य औषधीय दूध देती हैं। जबकि इसके उलट बंधी हुई गाय बंधे होने के कारण कभी प्रसन्न नही रहती, उसे पर्याप्त धूप नही मिलती जिससे सूर्यकेतु नाड़ी सक्रिय नही होती और उसका भोजन रसायनों से भरा होता है।

आज पूरा यूरोप, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया Grass Fed Milk की मांग कर रहा है।

गौअमृतं घृत को प्राकृतिक वातावरण में घूमने वाली, गंगा जल पीने वाली  गंगातीरी गाय के दूध से बनाकर लोगों को अमृतपान कराया जा रहा है।

धातु से बने पात्रों की तुलना में मिट्टी दूध पकाने के लिए सर्वोत्तम है। धातु के उलट मिट्टी अग्नि की कुचालक होती है जिससे दूध बहुत धीमी गति से गर्म होता है। धीमी गति से गर्म होने के कारण दूध में उपलब्ध सभी पोषक तत्व अपनी प्राकृतिक अवस्था मे विद्यमान रहते हैं और उन्हें कोई नुकसान नही पहुँचता।बल्कि धीमे धीमे पकने के कारण दूध में उपलब्ध उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन बेहद सुपाच्य अवस्था मे पहुंच जाता है।इसलिए मिट्टी में पका धीमी आंच का दूध ही सर्वोत्तम है।

गौ अमृतं घृत को बनाने में क्षीर सागर मंथन विधि का प्रयोग किया गया है। दांये बांये घूमने वाली लकड़ी की मथनी दही में विद्यमान ब्रह्म (गॉड पार्टिकल) ऊर्जा को मक्खन के रूप में अलग कर देती ।
यही ब्रह्म ऊर्जा युक्त माखन से गौअमृतं घृत बनाया जाता है।

स्वच्छन्द वातावरण में घूम कर और हरि भरी घास, वनौषधि खाने एवं सूर्य की ऊर्जा अपनी सूर्यकेतु नाड़ी में अवशोषित करने के कारण गंगातीरी गाय का दूध स्वर्ण आभा लिए हुए होता है। यही स्वर्ण आभा स्वर्ण छार यानी सूक्ष्म मात्रा में असली स्वर्ण(सोना) के कारण आती है इसलिए गौअमृतं घृत अलसी स्वर्ण युक्त पीले रंग का होता है। आयुर्वेद अनुसार सूक्ष्म मात्रा में स्वर्ण मस्तिक्ष की सबसे अच्छी औषधि रसायन है। यही स्वर्ण आभा युक्त मक्खन और घी खाकर कृष्ण जी को भगवान की उपाधि से अलंकृत किया गया। यही स्वर्ण छार युक्त घृत खाकर भगवान कृष्ण सोलह कलाओं में निपुण हुए।

गौअमृतं स्वर्ण छार युक्त घृत खाने से शरीर निरोगी और मस्तिक्ष कुशाग्र बनता है।